Nasir Kazmi लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Nasir Kazmi लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

दिल में इक लहर सी - Dil Mein Ik Leher Si (Ghulam Ali)



Lyrics By: नासिर काज़मी
Performed By: गुलाम अली

दिल में इक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी

शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में
कोई दीवार सी गिरी है अभी
दिल में इक लहर सी...

कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नयी है अभी
दिल में इक लहर सी...

याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी
दिल में इक लहर सी...

शहर की बेचिराग़ गलियों में
ज़िन्दगी तुझको ढूँढती है अभी
दिल में इक लहर सी...

आगे (गाने में नहीं है):
भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी
दिल में इक लहर सी...

तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या
हम-सुख़न तेरी ख़ामोशी है अभी
दिल में इक लहर सी...

सो गये लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी
दिल में इक लहर सी...

तुम तो यारो अभी से उठ बैठे
शहर में रात जागती है अभी
दिल में इक लहर सी...

वक़्त अच्छा भी आयेगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िन्दगी पड़ी है अभी
दिल में इक लहर सी...

Share:

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

गम है या खुशी है तू - Gham Hai Ya Khushi Hai Tu (Ghulam Ali)



Lyrics By: नासिर काज़मी
Performed By: गुलाम अली

ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

आफतों के दौर में
चैन की घड़ी है तू
गम है या खुशी...

मेरी रात का चिराग
मेरी नींद भी है तू
गम है या खुशी...

मैं खिज़ां की शाम हूँ
रूत बहार की है तू
गम है या खुशी...

दोस्तों के दरमियाँ
वजह दोस्ती है तू
गम है या खुशी...

मेरी सारी उम्र में
एक ही कमी है तू
गम है या खुशी...

मैं तो वो नहीं रहा
हाँ, मगर वोही है तू
गम है या खुशी...

'नासिर' इस दयार में
कितना अजनबी है तू
गम है या खुशी...

Share:

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

दयार-ए-दिल की रात में - Dayar-e-Dil Ki Raat Mein (Ghulam Ali, Asha Bhosle)



Movie/Album: मेराज-ए-गज़ल (1983)
Music By: गुलाम अली
Lyrics By: नासिर काज़मी
Performed By: गुलाम अली, आशा भोंसले

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ, वो शक़्ल तो दिखा गया

वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई
वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया
दयार-ए-दिल की...

जुदाइयों के ज़ख़्म, दर्द-ए-ज़िन्दगी ने भर दिये
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया
दयार-ए-दिल की...

ये सुबहो की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आईने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया
दयार-ए-दिल की...

ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ चला गया
दयार-ए-दिल की...

पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें
ज़मीं निगल गई उन्हें या आसमान खा गया
दयार-ए-दिल की...

गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक
अलम्कशो उठो कि आफ़ताब सर पे आ गया
दयार-ए-दिल की...

Share: