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शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

दिल में इक लहर सी - Dil Mein Ik Leher Si (Ghulam Ali)



Lyrics By: नासिर काज़मी
Performed By: गुलाम अली

दिल में इक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी

शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में
कोई दीवार सी गिरी है अभी
दिल में इक लहर सी...

कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नयी है अभी
दिल में इक लहर सी...

याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी
दिल में इक लहर सी...

शहर की बेचिराग़ गलियों में
ज़िन्दगी तुझको ढूँढती है अभी
दिल में इक लहर सी...

आगे (गाने में नहीं है):
भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी
दिल में इक लहर सी...

तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या
हम-सुख़न तेरी ख़ामोशी है अभी
दिल में इक लहर सी...

सो गये लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी
दिल में इक लहर सी...

तुम तो यारो अभी से उठ बैठे
शहर में रात जागती है अभी
दिल में इक लहर सी...

वक़्त अच्छा भी आयेगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िन्दगी पड़ी है अभी
दिल में इक लहर सी...

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गुरुवार, 29 अगस्त 2013

हमको किसके गम ने मारा - Humko Kiske Gham Ne Maara (Ghulam Ali)



Lyrics By: मसरूर अनवर
Performed By: गुलाम अली

हमको किसके गम ने मारा, ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही

दिल के लूटने का सबब पूछो न सबके सामने
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके गम ने...

नफरतों के तीर खा कर, दोस्तों के शहर में
हमने किस किस को पुकारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके गम ने...

क्या बताएं प्यार की बाजी, वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा, ये कहानी फिर सही
हमको किसके गम ने...

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बुधवार, 28 अगस्त 2013

कैसी चली है अब के हवा - Kaisi Chali Hai Ab Ke Hawa (Ghulam Ali)



Lyrics By: खातिर गज़नवी
Performed By: गुलाम अली

कैसी चली है अब के हवा, तेरे शहर में
बन्दे भी हो गये हैं ख़ुदा, तेरे शहर में

क्या जाने क्या हुआ कि परेशान हो गए
इक लहज़ा रुक गयी थी सबा तेरे शहर में
बन्दे भी हो गये...

कुछ दुश्मनी का ढब है न अब दोस्ती के तौर
दोनों का एक रंग हुआ तेरे शहर में
बन्दे भी हो गये...

शायद उन्हें पता था कि 'ख़ातिर' है अजनबी
लोगों ने उसको लूट लिया तेरे शहर में
बन्दे भी हो गये...

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मंगलवार, 27 अगस्त 2013

गम है या खुशी है तू - Gham Hai Ya Khushi Hai Tu (Ghulam Ali)



Lyrics By: नासिर काज़मी
Performed By: गुलाम अली

ग़म है या खुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

आफतों के दौर में
चैन की घड़ी है तू
गम है या खुशी...

मेरी रात का चिराग
मेरी नींद भी है तू
गम है या खुशी...

मैं खिज़ां की शाम हूँ
रूत बहार की है तू
गम है या खुशी...

दोस्तों के दरमियाँ
वजह दोस्ती है तू
गम है या खुशी...

मेरी सारी उम्र में
एक ही कमी है तू
गम है या खुशी...

मैं तो वो नहीं रहा
हाँ, मगर वोही है तू
गम है या खुशी...

'नासिर' इस दयार में
कितना अजनबी है तू
गम है या खुशी...

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रविवार, 18 अगस्त 2013

आप हैं क्यों ख़फ़ा - Aap Hain Kyon Khafa (Ghulam Ali)



Performed By: गुलाम अली

आप हैं क्यों ख़फ़ा, कुछ पता तो चले
है मेरी क्या खता, कुछ पता तो चले

आज चेहरे पे रंग-ए-उदासी क्यूँ
ऐ मेरे दिलरुबा कुछ पता तो चले
आप हैं क्यों खफ़ा...

आपके और मेरे प्यार के दरमियाँ
क्यों है यह फासिला कुछ पता तो चले
आप हैं क्यों ख़फ़ा...

मैं अगर बेवफा हूँ तो यूँ ही सही
कौन है बावफा कुछ पता तो चले
आप हैं क्यों खफ़ा...

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शनिवार, 17 अगस्त 2013

चमकते चाँद को टूटा - Chamakte Chand Ko Toota (Ghulam Ali, Awaargi)



Movie/Album: आवारगी (1990)
Music By: अनु मालिक
Lyrics By: आनंद बक्षी
Performed By: गुलाम अली

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला

बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर की गलियों का बंजारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा...

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा...

मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा...

यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था
मेरी तक़दीर ने मुझको, तक़दीर का मारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा...

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शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

हम तेरे शहर में आए हैं - Hum Tere Sheher Mein Aaye Hain (Ghulam Ali)



Lyrics By: कैसर उल जाफ़रीPerformed By: गुलाम अली

हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह
सिर्फ़ इक बार मुलाक़ात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में...

मेरी मंजिल है, कहाँ मेरा ठिकाना है कहाँ
सुबह तक तुझसे बिछड़ कर मुझे जाना है कहाँ
सोचने के लिए इक रात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में...

अपनी आंखों में छुपा रक्खे हैं जुगनू मैंने
अपनी पलकों पे सजा रक्खे हैं आंसू मैंने
मेरी आंखों को भी बरसात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में...

आज की रात मेरा दर्द-ऐ-मोहब्बत सुन ले
कंप-कंपाते हुए होठों की शिकायत सुन ले
आज इज़हार-ऐ-खयालात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में...

भूलना ही था तो ये इकरार किया ही क्यूँ था
बेवफा तुने मुझे प्यार किया ही क्यूँ था
सिर्फ़ दो चार सवालात का मौका दे दे
हम तेरे शहर में...

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गुरुवार, 15 अगस्त 2013

दयार-ए-दिल की रात में - Dayar-e-Dil Ki Raat Mein (Ghulam Ali, Asha Bhosle)



Movie/Album: मेराज-ए-गज़ल (1983)
Music By: गुलाम अली
Lyrics By: नासिर काज़मी
Performed By: गुलाम अली, आशा भोंसले

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ, वो शक़्ल तो दिखा गया

वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई
वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया
दयार-ए-दिल की...

जुदाइयों के ज़ख़्म, दर्द-ए-ज़िन्दगी ने भर दिये
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया
दयार-ए-दिल की...

ये सुबहो की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आईने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया
दयार-ए-दिल की...

ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ चला गया
दयार-ए-दिल की...

पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें
ज़मीं निगल गई उन्हें या आसमान खा गया
दयार-ए-दिल की...

गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक
अलम्कशो उठो कि आफ़ताब सर पे आ गया
दयार-ए-दिल की...

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बुधवार, 14 अगस्त 2013

ज़ख्म-ए-तन्हाई में - Zakhm-e-Tanhai Mein (Ghulam Ali)



Lyrics By: मुज़फ्फर वारसी
Performed By: गुलाम अली

ज़ख्म-ए-तन्हाई में खुश्बू-ए-हिना किसकी थी
साया दिवार पे मेरा था, सदा किसकी थी

आंसुओं से ही सही भर गया दामन मेरा
हाथ तो मैंने उठाये थे, दुआ किसकी थी
साया दीवार पे...

मेरी आहों की ज़बां कोई समझता कैसे
ज़िन्दगी इतनी दुखी मेरे सिवा किसकी थी
साया दीवार पे...

छोड़ दी किसके लिए तूने 'मुज़फ्फर' दुनिया
जुस्तजू सी तुझे हर वक्त बता किसकी थी
साया दीवार पे...

आगे (रिकॉर्डिंग में नहीं है पर गज़ल में है):
उसकी रफ़्तार से लिपटी रहती मेरी आँखें
उसने मुड़ कर भी ना देखा कि वफ़ा किसकी थी

वक्त की तरह दबे पाँव ये कौन आया
मैं अँधेरा जिसे समझा वो काबा किसकी थी
आग से दोस्ती उसकी थी जला घर मेरा
दी गयी किसको सजा और खता किसकी थी

मैंने बिनाइयां बो कर भी अँधेरे काटे
किसके बस में थी ज़मीं अब्र-ओ-हवा किसकी थी

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मंगलवार, 13 अगस्त 2013

वो कभी मिल जाएँ तो - Wo Kabhi Mil Jaaein To (Ghulam Ali)



Lyrics By: अख्तर शीरानी
Performed By: गुलाम अली

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए
रात दिन सूरत को देखा कीजिए

चाँदनी रातों में इक-इक फूल को
बे-ख़ुदी कहती है सजदा कीजिए
वो कभी मिल जाएँ...

जो तमन्ना बर न आए उम्र भर
उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए
वो कभी मिल जाएँ...

इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर
चाँदनी रातों में रोया कीजिए
वो कभी मिल जाएँ...

पूछ बैठे हैं हमारा हाल वो
बे-ख़ुदी तू ही बता क्या कीजिए
वो कभी मिल जाएँ...

हम ही उस के इश्क़ के क़ाबिल न थे
क्यूँ किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए
वो कभी मिल जाएँ...

आगे (गाने में नहीं है):
आप ही ने दर्द-ए-दिल बख़्शा हमें
आप ही इस का मुदावा कीजिए
वो कभी मिल जाएँ...

कहते हैं 'अख़्तर' वो सुन कर मेरे शेर
इस तरह हमको न रुसवा कीजिए
वो कभी मिल जाएँ...

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सोमवार, 1 नवंबर 2010

ऐ हुस्न-ए-बेपरवाह तुझे



Singer: Ghulam Ali

ऐ हुस्न-ए-बेपरवाह तुझे शबनम कहूँ शोला कहूँ
फूलों में भी शोख़ी तो है किसको मगर तुझसा कहूँ

गेसू उड़े महकी फ़ज़ा जादू करें आँखें तेरी
सोया हुआ मंज़र कहूँ या जागता सपना कहूँ

चंदा की तू है चाँदनी लहरों की तू है रागिनी
जान-ए-तमन्ना मैं तुझे क्या क्या कहूँ क्या ना कहूँ



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रविवार, 24 अक्टूबर 2010

इक दिया दिल में जलाना भी बुझा भी देना



Singer: Ghulam Ali

इक दिया दिल में जलाना भी बुझा भी देना
याद करना भी उसे रोज़ भुला भी देना

क्या कहूँ यह मेरी चाहत है के नफरत उसकी
नाम लिखना भी मेरा लिख के मिटा भी देना

खत भी लिखना उसे मायूस भी रहना उससे
जुर्म करना भी मगर खुद को सज़ा भी देना

उससे मनसूब भी कर लेना पुराने किस्से
उसके बालों में नया फूल सजा भी देना



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